हिन्दू धर्म के अनुसार काल अनंत है. उसे सीमाओं में बांधा नहीं जा सकता.
"अनादिरेश भगवान कालो अनन्तो अजरो अमराः !
सर्व्गत्वातस्वतन्त्रत्त्वातसर्वात्मत्वान्महेश्वरह !!
अतएव हम उसे किसी सीमा में नहीं बांध सकते. पर लोक व्यवहार के लिए उसे हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों एवं दार्शनिकों ने कुछ सीमाएं दीं हैं. जैसा के "नारद पुराण" में लिखा है कि :- इस प्रकार नारद जी के पूछने पर उनके बड़े भाई श्रीसनकजी ने कहा :
"ब्रह्मन, यह संसार जब प्रलयकाल में एकार्णव के जल में विलीन हो गया तब भी भगवान के तेज से उनका नाश नहीं हुआ. भगवन श्रीहरी जब तक सोते रहे तब तक मार्कंडेय ऋषि वहां पर चुपचाप खड़े रहे. उस समय का माप मैं तुम्हें बतला रहा हूँ, सुनिए.
तब श्रीसनकजी ने काल का जो परिमाण बताया उए संक्षेप में नीचे दे रहे हैं :
१५ निमेष = १ काष्ठा
३० काष्ठा = १ कला
३० कला = १ क्षण
६ क्षण = १ घड़ी
२ घड़ी = १ मुहूर्त
३० मुहूर्त = १ दिनरात
१५ दिन = १ पक्ष
२ पक्ष = १ मास
२ मास = १ ऋतु
३ ऋतुओं = १ अयन
२ अयन = १ वर्ष
इस प्रकार से हम देखते हैं कि समय का पैमाना जो कि आजकल उपयोग होता है, उससे भिन्न और सूक्ष्म हमारे मनीषियों ने ढूंढ़ लिया था और वह इस्तेमाल में भी आ रहा था.